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आज के शहरी समाज में लोग लगातार नई-नई भूमिकाओं को अपनाते हैं – पेशा, सामाजिक स्थिति, तकनीकी उपयोग। इस निरंतर परिवर्तन ने ‘अन्तरवासन’ को अनिवार्य बना दिया है। लोग अक्सर अपने ‘जन्म‑स्थली’ या पारिवारिक मूल्यों से ‘विच्छिन्न’ हो जाते हैं और नए सामाजिक परिप्रेक्ष्य में खुद को फिर से परिभाषित करने के लिए ‘अन्तरवासन’ को अपनाते हैं।

समकालीन समाज में तेज़ी से बढ़ते बाहरी दबाव, सूचना‑प्रौद्योगिकी के अतिव्यापी प्रभाव और व्यक्तिगत आकांक्षाओं की अनिश्चितता ने इस ‘अन्तरवासन’ को एक अनिवार्य मनो‑यात्रा बना दिया है। यह न केवल एक वैचारिक, बल्कि एक अनुभवात्मक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने ‘मैं’ को अलग‑अलग परतों में विभाजित करता है और फिर उन परतों को समझते‑समझते फिर से एकजुट करता है।

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